कृति 

 

ईश्वर की सर्वोत्तम कृति
होने का  अनुपम गौरव मिला ,
संसार में रचना मानव की है
प्रेम की अद्भुत आधारशिला |
किंतु इस जीवन की ये कैसी विडंबना
एक क्षण जो हँसता ये मानव मन
एक क्षण फिर अश्रु से बना |
जीवन के हिंडोले में झूलता रहता
ऊपर से नीचे, नीचे से ऊपर
जीवन की तो है रीत यही
ये समझे न अपना मन क्यों कर |
प्रेम, ईष्र्या, दया, क्रूरता
इनसे प्रभु ने जो रूप रचाया
भाग्य गढ़ने की शक्ति देकर
भाग्य विधाता वो स्वयं कहलाया |
एक ही ये संसार है सारा
एक ही इसको रचने वाला
हर एक प्राणी इस धरती का
उसके ही हैं बाल और बाला |
अपना अपना भाग्य बदल दें
क्या है यह इतना आसान ?
उक्ति- सूक्ति पढ़ते पढ़ते
स्वतः हो आया ये संज्ञान!
मुझमें, तुममें और हम सब में
निहित ही है वो आदि-शक्ति
अंधकार में प्रज्वलित कर दे जो
स्वाभिमान की उज्जवल ज्योति |
किंतु इस शक्ति के जागरण
हेतु कैसे छोडूं  आडम्बर- आवरण ?
इन्हीं विचारों में थी उलझी,
स्वयं ही सहसा गुत्थी सुलझी..
सहसा ही संध्या बेला में,
शंखनाद से टूटी तंद्रा
शक्ति ने स्वयं ही जैसे
छोड़ दी पीछे अपनी निद्रा |
ईश्वर की सर्वोत्तम “कृति” मैं !!
मैं मानव , हर रूप में सक्षम 
इसी ऊर्जा को तो बस 
एक अविरल अनवरत गति दे हम तुम, 
 सहज ही सारे पथ आलोकित होंगे 
जब मिटेगा मन का  गहरा तम !!
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