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English/Hindi Poetries inked with emotions

Book Review: Thirteen Kinds Of Love

Short stories are one of my favorite genres to read, reason being the feeling of savoring many books in single go.
I know a book shouldn’t be judged by its cover, but honestly speaking the beautiful red cover of Thirteen Kinds Of Love showcasing a tower of several faces is what fascinated me to pick it up.

13 short stories that stand independent and are still intertwined is what Thirteen Kinds of Love by Soumya Bhattacharya is about.

The book is set in Mumbai, in a coveted block of apartments called Imperial Heights where several families inhabit. Author Soumya introduces us to each family through a story based on which we form opinions, likes, dislikes and judgement. Each story gives a lot to chew on as well. The most appealing part of the stories was how the author tried to interconnect each of the characters with the previously mentioned characters. What I liked the most is that the stories also allow us to introspect and empathize with characters.

Though the book starts with rather dark stories it thankfully progresses to becoming hopeful as it nears the end. The author explores the unseen & unspoken emotions of people, telling their tales of love, lust, separation, loss and getting back together.

Soumya Bhattacharya’s precise and beautiful writing is unparalleled.
This slim book with a surprise element in every part is a quick read you can finish in one go.

My rating: 4.5/5

 

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THIS REVIEW HAS BEEN WRITTEN AS PART OF “Blogchatter Book Review Program”

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रूह के  फ़रिश्ते 

आज फिर खुला है मेरी
यादों का पिटारा..
आज फिर उन्हें करीब से
मैंने है निहारा..
वो सब के सब फिर से
यहाँ आ गये हैं जैसे
स्कूल-ड्रेस पहने, साइकिल की घंटी
बजाते मुझे लुभा गये हैं ऐसे
फिर से हम साथ में टिफिन
खोल रहे हैं..
फिर से ताली पीट, हंस के
लोट-पोट हो रहे हैं..
दिवाली की छुट्टी के पहले वो
किसी का चुपके से बम फोड़ना
दोस्ती निभाने की खातिर
टीचर की डांटे ओढना
कान पकड़ के खड़े हों
या खड़े हों सब मेज़ पर
सारी  यादों को रखा है
अब तक यूँही सहेज कर
वक़्त बहुत बदला है
ज़िन्दगी भी आगे बढ़ गयी
अपना वजूद तलाशने की
खुमारी सब में चढ़ गयी
आँखे जब हों खुली हुई
कोई दिल्ली, कोई पूना है
उन कमीनों के बिना तो
जहान बंजर है, सूना है
पर बंद करूँ जैसे ही पलकें
मंज़र बदल जाते हैं
दूरियों की जंजीरें तोड़
सब बढे चले आते हैं
कभी हैं रूठ जाते
कभी मुझे मनाते
बकवास से कभी तो
मेरी ये जान खाते
एक क़तरा भी जो गम में
कभी मैंने बहाया
हर एक कमीने को ही
कन्धा बढ़ाते पाया
इनकी गाली में भी मज़ा है
इनके बिन जिंदगी सजा है
जादुई है इनकी बस्ती
इनसे ही है मेरी हस्ती
ये दोस्तों के भेस में
 बख्शे गए हैं फ़रिश्ते
ये खून के नहीं हैं, पर
खून से भी बढ़ के रिश्ते
खुदा की रहमत मानूँ
जो नवाज़ी ऐसी किस्मत
इन पागलों से बढ़कर
नहीं है कोई नेमत
नहीं है कोई नेमत..
o.jpg

कृति 

 

ईश्वर की सर्वोत्तम कृति
होने का  अनुपम गौरव मिला ,
संसार में रचना मानव की है
प्रेम की अद्भुत आधारशिला |
किंतु इस जीवन की ये कैसी विडंबना
एक क्षण जो हँसता ये मानव मन
एक क्षण फिर अश्रु से बना |
जीवन के हिंडोले में झूलता रहता
ऊपर से नीचे, नीचे से ऊपर
जीवन की तो है रीत यही
ये समझे न अपना मन क्यों कर |
प्रेम, ईष्र्या, दया, क्रूरता
इनसे प्रभु ने जो रूप रचाया
भाग्य गढ़ने की शक्ति देकर
भाग्य विधाता वो स्वयं कहलाया |
एक ही ये संसार है सारा
एक ही इसको रचने वाला
हर एक प्राणी इस धरती का
उसके ही हैं बाल और बाला |
अपना अपना भाग्य बदल दें
क्या है यह इतना आसान ?
उक्ति- सूक्ति पढ़ते पढ़ते
स्वतः हो आया ये संज्ञान!
मुझमें, तुममें और हम सब में
निहित ही है वो आदि-शक्ति
अंधकार में प्रज्वलित कर दे जो
स्वाभिमान की उज्जवल ज्योति |
किंतु इस शक्ति के जागरण
हेतु कैसे छोडूं  आडम्बर- आवरण ?
इन्हीं विचारों में थी उलझी,
स्वयं ही सहसा गुत्थी सुलझी..
सहसा ही संध्या बेला में,
शंखनाद से टूटी तंद्रा
शक्ति ने स्वयं ही जैसे
छोड़ दी पीछे अपनी निद्रा |
ईश्वर की सर्वोत्तम “कृति” मैं !!
मैं मानव , हर रूप में सक्षम 
इसी ऊर्जा को तो बस 
एक अविरल अनवरत गति दे हम तुम, 
 सहज ही सारे पथ आलोकित होंगे 
जब मिटेगा मन का  गहरा तम !!
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